*योगी को हटाना भाजपा के लिए कितना आसान*

*भाजपा योगी की लोकप्रियता को सामाजिक विस्तार, विकास, कानून-व्यवस्था और मजबूत उम्मीदवार चयन के साथ जोड़ देती है, तो वह सत्ता में वापसी की मजबूत स्थिति बना सकती है*

लेखकडाॅ.अरविंद नाथ तिवारी


उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ भाजपा के भीतर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व को लेकर चर्चाओं का दौर तेज है। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या भाजपा उत्तर प्रदेश में भी वही प्रयोग दोहरायेगी, जो उसने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में किया था? क्या चुनाव से पहले किसी नए चेहरे को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा सत्ता-विरोधी भावनाओं को कम करने और जातीय समीकरणों को साधने की कोशिश करेगी?भाजपा के इतिहास को देखें तो यह संभावना पूरी तरह असंभव नहीं है। 2023 में मध्य प्रदेश में लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान की जगह मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया गया। राजस्थान में दो बार मुख्यमंत्री रह चुकीं वसुंधरा राजे की जगह भजनलाल शर्मा को जिम्मेदारी मिली। छत्तीसगढ़ में भी रमन सिंह के स्थान पर विष्णुदेव साय को मुख्यमंत्री बनाया गया। इन बदलावों के पीछे भाजपा की रणनीति में नए नेतृत्व, सामाजिक समीकरण और संगठन को प्राथमिकता देने की बात सामने आई थी,लेकिन उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश या राजस्थान नहीं है।

उत्तर प्रदेश का राजनीतिक आकार, सामाजिक जटिलता और राष्ट्रीय राजनीति में उसका महत्व इतना बड़ा है कि यहां मुख्यमंत्री का चेहरा बदलना केवल संगठनात्मक फैसला नहीं होगा, बल्कि उसका सीधा असर चुनावी रणनीति पर पड़ेगा,यही वजह है कि योगी आदित्यनाथ को हटाने की चर्चा जितनी आसान लगती है, व्यवहार में उतनी ही कठिन दिखाई देती है।हाल में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने उत्तर प्रदेश का दौरा कर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की। संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने और 2027 के चुनाव के लिए व्यापक रणनीति बनाने पर जोर दिया गया।हालांकि राजनीतिक चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि केंद्र और प्रदेश नेतृत्व के बीच मुख्यमंत्री के भविष्य तथा चुनावी रणनीति को लेकर अलग-अलग विकल्पों पर विचार हुआ। इन चर्चाओं में योगी को केंद्र में लाने से लेकर चुनाव में सामाजिक समीकरणों के अनुसार टिकट वितरण तक की बातें कही जा रही हैं। लेकिन इन दावों की स्वतंत्रआधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इन्हें अभी भाजपा की घोषित नीति मानना जल्दबाजी होगी।

असल प्रश्न यह है कि यदि भाजपा योगी के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ती है और योगी की राजनीति का केंद्रीय आधार हिंदुत्व तथा सनातन का मुद्दा रहता है, तो क्या इससे भाजपा दोबारा सत्ता में आ सकती है?इस प्रश्न का उत्तर केवल ‘हां’ या ‘नहीं’ में नहीं दिया जा सकता।योगी आदित्यनाथ की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उनका स्पष्ट और आक्रामक राजनीतिक व्यक्तित्व है। वे भाजपा के उन नेताओं में हैं जिनकी अपनी पहचान पार्टी के संगठनात्मक ढांचे से बाहर भी बनी हुई है। उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था, धार्मिक पर्यटन, अयोध्या, काशी, मथुरा और हिंदुत्व जैसे मुद्दों पर उनकी स्पष्ट राजनीतिक लाइन है। उनके समर्थकों के लिए यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है,लेकिन चुनाव केवल धार्मिक भावनाओं से नहीं जीते जाते। चुनाव में जातीय समीकरण, उम्मीदवारों का चयन, स्थानीय असंतोष, बेरोजगारी, किसान, युवा, महिला मतदाता, कानून-व्यवस्था, महंगाई और विकास जैसे मुद्दे भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

2024 के लोकसभा चुनाव ने भाजपा को उत्तर प्रदेश में इसी वास्तविकता का संकेत दिया था। भाजपा की सीटें 2019 के 62 से घटकर 2024 में 33 रह गईं, जबकि समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी और कांग्रेस ने छह सीटें जीतीं।इसलिए भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह योगी की लोकप्रियता और हिंदुत्व की राजनीति को बनाए रखते हुए सामाजिक समीकरणों को किस तरह अपने पक्ष में करती है।समाजवादी पार्टी का PDA—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक—फॉर्मूला भाजपा के लिए चुनौती बन चुका है। भाजपा यदि केवल धार्मिक ध्रुवीकरण पर निर्भर रहती है और पिछड़े, दलित तथा अति-पिछड़े वर्गों के भीतर अपनी पकड़ कमजोर होने देती है, तो उसे चुनाव में कठिनाई हो सकती है।यहीं मुख्यमंत्री बदलने की चर्चा का दूसरा पहलू सामने आता है।भाजपा ने पहले भी यह संदेश दिया है कि कोई भी मुख्यमंत्री पार्टी से बड़ा नहीं है। शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे जैसे मजबूत क्षेत्रीय नेताओं को हटाकर नए चेहरों को मुख्यमंत्री बनाने का प्रयोग इसका उदाहरण है।

विश्लेषकों के अनुसार ऐसे बदलावों से पार्टी क्षेत्रीय सत्ता-केंद्रों को सीमित करने और नए सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश करती रही है,लेकिन योगी आदित्यनाथ के मामले में परिस्थितियां अलग हैं।योगी केवल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं हैं। वह भाजपा के व्यापक हिंदुत्व विमर्श का एक प्रमुख चेहरा बन चुके हैं। उन्हें अचानक मुख्यमंत्री पद से हटाने का अर्थ होगा कि भाजपा को चुनाव से ठीक पहले अपने सबसे पहचाने जाने वाले प्रदेश स्तरीय चेहरे की भूमिका बदलनी पड़ेगी। इससे समर्थक वर्ग में कैसी प्रतिक्रिया होगी, यह भी महत्वपूर्ण सवाल होगा।दूसरी ओर, योगी को बनाए रखने का अर्थ यह नहीं है कि भाजपा केवल ‘सनातन’ के भरोसे चुनाव जीत जायेगी।भाजपा को योगी के चेहरे के साथ सामाजिक प्रतिनिधित्व का संतुलन भी बनाना होगा। टिकट वितरण में पिछड़ा, अति-पिछड़ा, दलित, महिला और युवाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देना होगा। संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करना होगा। यही कारण है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के उत्तर प्रदेश दौरे में संगठन को मजबूत करने और विभिन्न सामाजिक वर्गों तक पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया गया।

इसलिए असली चुनावी रणनीति शायद ‘सनातन बनाम आरक्षण’ नहीं, बल्कि ‘सनातन ,सामाजिक न्याय , विकास , संगठन’ का मिश्रण हो सकती है।योगी को हटाकर नया मुख्यमंत्री बनाने का जोखिम यह है कि पार्टी को चुनाव से पहले अपना स्थापित नेतृत्व बदलना पड़ेगा। वहीं योगी को बनाए रखने की चुनौती यह है कि उनके नेतृत्व में भाजपा को 2024 की लोकसभा चुनावी कमजोरी से बाहर निकलना होगा।हालिया घटनाक्रम से फिलहाल संकेत यह नहीं मिलता कि भाजपा ने योगी को हटाने का कोई सार्वजनिक निर्णय लिया है। बल्कि भाजपा के उत्तर प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े ने हाल में स्पष्ट रूप से कहा कि आगामी विधानसभा चुनाव योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर लड़ा जायेगा और विकास को प्रमुख मुद्दा बनाया जायेगा।इससे एक बात स्पष्ट होती है—भाजपा के सामने इस समय सबसे बड़ा सवाल योगी को हटाना नहीं, बल्कि योगी के नेतृत्व को चुनावी रूप से अधिक प्रभावी बनाना है।यदि भाजपा योगी की लोकप्रियता को सामाजिक विस्तार, विकास, कानून-व्यवस्था और मजबूत उम्मीदवार चयन के साथ जोड़ देती है, तो वह सत्ता में वापसी की मजबूत स्थिति बना सकती है।

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