दोन की पीड़ा: आजादी के 79 साल बाद भी बुनियादी सुविधाओं का इंतजार


लेखक–डाॅ.अरविंद नाथ तिवारी
बिहार में चंपारण के दोन क्षेत्र की कहानी आजाद भारत के उन इलाकों की कहानी है, जहां स्वतंत्रता के 79 वर्ष गुजर जाने के बाद भी विकास की बुनियादी रोशनी पूरी तरह नहीं पहुंच सकी है। जंगल, पहाड़ और नदियों से घिरे इस दुर्गम क्षेत्र में रहने वाले थारू एवं अन्य आदिवासी समुदायों ने समय के साथ बहुत कुछ बदलते देखा, लेकिन उनकी रोजमर्रा की जिंदगी की अनेक मूलभूत समस्याएं आज भी जस की तस हैं। सरकारें बदलीं, राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और विकास की योजनाएं बनीं, लेकिन दोन का भौगोलिक और प्रशासनिक पिछड़ापन आज भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।दोन क्षेत्र लंबे समय तक सरकारी उपेक्षा का शिकार रहा। आजादी के शुरुआती लगभग चार दशकों में यहां शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली, संचार और आवागमन जैसी बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव रहा। नक्सलवाद और दस्यु सरगनाओं के प्रभाव के कारण भी लंबे समय तक यह इलाका सामान्य जीवन से दूर रहा। बाद के वर्षों में राजनीतिक इच्छाशक्ति और सरकारी हस्तक्षेप से स्थिति में बदलाव शुरू हुआ। केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान थारू समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलने के बाद विकास की नई संभावनाएं खुलीं। बिहार में नीतीश कुमार की सरकार के दौरान थारू विकास प्राधिकरण के गठन ने भी इस समुदाय के सामाजिक और आर्थिक विकास को संस्थागत आधार दिया।

इन प्रयासों का असर दिखाई भी दिया। जिस इलाके के बच्चों के लिए उच्च शिक्षा तक पहुंचना कभी सपना था, वहां से आज बच्चे और बच्चियां मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे प्रतिष्ठित क्षेत्रों तक पहुंच रहे हैं। विद्यालयों की स्थापना हुई, स्वास्थ्य केंद्रों का विस्तार हुआ, सड़कों का निर्माण हुआ और सरकारी योजनाओं की पहुंच बढ़ी। लेकिन इन उपलब्धियों के बावजूद दोन क्षेत्र की बुनियादी समस्याओं का पूरी तरह समाधान नहीं हो पाया है।इसका सबसे बड़ा कारण है दोन की कठिन भौगोलिक स्थिति। शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में स्थित यह इलाका जंगलों और नदियों से घिरा हुआ है। लगभग 32 किलोमीटर लंबाई और 6 से 8 किलोमीटर चौड़ाई वाले इस क्षेत्र में बरसात का मौसम विकास की तमाम कमजोरियों को सामने ला देता है। नदियों में पानी बढ़ते ही गांवों का संपर्क मुख्य मार्गों और प्रमुख चिकित्सा केंद्रों से टूटने लगता है। यही स्थिति कई बार लोगों के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन जाती है।हाल में सामने आई एक घटना ने इस दर्द को फिर उजागर कर दिया। सिंगड़हवा दोन की रहने वाली सुमन गर्भवती थीं। उनकी शादी ढोलबजवा गांव निवासी संजीत उरांव से हुई थी और यह उनका दूसरा बच्चा था। पिछले कुछ दिनों से वह अपने मायके में रह रही थीं। प्रसव पीड़ा के दौरान उन्हें अस्पताल पहुंचाने की कोशिश की गई, लेकिन बरसात में उफनती हरहा नदी रास्ते में बड़ी बाधा बन गई। समय पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाने के कारण उनकी जान चली गई।नौरंगिया पंचायत के मुखिया गौरी शंकर प्रसाद ने भी इस घटना की पुष्टि करते हुए कहा कि दोन क्षेत्र में नदियों पर पुल-पुलिया का अभाव बड़ी समस्या है। बरसात में आवागमन बेहद कठिन हो जाता है और गंभीर मरीजों तथा गर्भवती महिलाओं को समय पर अस्पताल पहुंचाना चुनौती बन जाता है।सिंगड़हवा दोन से रामनगर प्रखंड मुख्यालय की दूरी लगभग 48 किलोमीटर है, जबकि हरनाटांड़ करीब 21 किलोमीटर दूर है। चिकित्सा सुविधा के लिहाज से हरनाटांड़ दोन क्षेत्र के लिए प्रमुख केंद्र है। लेकिन बरसात के दिनों में हरहा नदी ही इलाज और जिंदगी के बीच दीवार बन जाती है। यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है। स्थानीय लोगों के अनुसार, वर्षों से बरसात के मौसम में पुल-पुलिया के अभाव और समय पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिलने के कारण कई गर्भवती महिलाओं तथा गंभीर मरीजों की जान जा चुकी है।दोन के बच्चों की शिक्षा भी इसी समस्या से प्रभावित होती है। बरसात में नदियों का जलस्तर बढ़ने पर कई बच्चे विद्यालय नहीं पहुंच पाते। जिन रास्तों से सामान्य दिनों में आवागमन संभव है, वे बारिश के दिनों में जोखिम भरे हो जाते हैं। सवाल यह है कि जब किसी बच्चे को शिक्षा प्राप्त करने के लिए नदी पार करनी पड़े और किसी गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचने के लिए जान जोखिम में डालनी पड़े, तो विकास की वास्तविक तस्वीर क्या हो सकती है?दोन क्षेत्र की एक और गंभीर समस्या वन कानूनों से जुड़ी है। जंगल क्षेत्र में रहने वाले लोगों की आवश्यकताओं और वन संरक्षण के बीच संतुलन कायम करना जरूरी है। वन संरक्षण पर्यावरण के लिए अनिवार्य है, लेकिन ऐसे कानून और प्रक्रियाएं जो सड़क, पुल, विद्यालय, अस्पताल, बिजली और संचार जैसी आवश्यक सुविधाओं के विकास में अनावश्यक बाधा बन जाएं, उन पर मानवीय दृष्टिकोण से पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
इसी मुद्दे को वाल्मीकिनगर के सांसद सुनील कुमार ने सोमवार को लोकसभा में नियम 377 के तहत उठाकर दोन क्षेत्र की समस्याओं को राष्ट्रीय मंच पर पहुंचाया है। उन्होंने संसद को बताया कि वन विभाग के अव्यवहारिक कानूनों के चलते दोन निवासी सड़क, पुल, शिक्षा, स्वास्थ्य, विद्युत और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं के संकट से जूझ रहे हैं। उन्होंने वन कानूनों के प्रावधानों को मानवता के हित में शिथिल करते हुए लोगों को आसान और सुरक्षित जीवन के लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया।
अब जरूरत केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि समयबद्ध कार्ययोजना की है। सबसे पहले उन स्थानों को चिन्हित किया जाना चाहिए जहां बरसात में संपर्क पूरी तरह टूट जाता है। हरहा सहित प्रमुख नदियों पर स्थायी पुल-पुलियों का निर्माण, स्वास्थ्य केंद्रों को पर्याप्त संसाधनों से लैस करना, आपातकालीन एंबुलेंस व्यवस्था, विद्यालयों तक सुरक्षित पहुंच, बिजली और मोबाइल नेटवर्क का विस्तार प्राथमिकता में होना चाहिए।दोन के विकास का मतलब जंगलों को खत्म करना नहीं है। विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाकर भी इस क्षेत्र को आधुनिक सुविधाओं से जोड़ा जा सकता है। स्थानीय समुदायों को विकास प्रक्रिया में सहभागी बनाना होगा और वन कानूनों के क्रियान्वयन में मानवीय संवेदना को प्राथमिकता देनी होगी।आज दोन के लोग सरकार से किसी विशेष कृपा की मांग नहीं कर रहे हैं। वे वही अधिकार मांग रहे हैं जो देश के दूसरे नागरिकों को सहज रूप से उपलब्ध हैं—सड़क, पुल, विद्यालय, अस्पताल, बिजली, संचार और सुरक्षित आवागमन।आजादी के 79 वर्ष बाद दोन के लोगों का यह सवाल पूरी व्यवस्था से है कि आखिर उनके हिस्से का विकास कब पूरा होगा? सुमन की मौत को यदि एक चेतावनी के रूप में देखा जाए, तो शायद अब वह समय आ गया है जब सरकार को कागजी योजनाओं से आगे बढ़कर दोन के लिए जमीन पर दिखाई देने वाला स्थायी समाधान देना होगा।