बिहार की बाढ़: राहत नहीं, अब चाहिए स्थायी समाधान
*बिहार को अब राहत की राजनीति नहीं, स्थायी समाधान की नीति चाहिए। जनता के टैक्स के पैसे का इस्तेमाल हर साल बाढ़ के बाद नुकसान भरने में करने के बजाय ऐसी व्यवस्था बनाने में होना चाहिए जिससे नुकसान की संभावना ही कम हो*


लेखक-डाॅ.अरविंद नाथ तिवारी
बिहार की बाढ़ कोई नई त्रासदी नहीं है। दशकों से उत्तर बिहार के लोग हर वर्ष बाढ़ की विभीषिका झेलते आ रहे हैं। बारिश नेपाल में हो या हिमालयी क्षेत्र में, उसका असर बिहार की नदियों और यहां के गांवों पर दिखाई देता है। नदियों का जलस्तर बढ़ता है, गांव डूबते हैं, सड़कें और पुल क्षतिग्रस्त होते हैं, फसलें बर्बाद होती हैं और हजारों परिवार राहत शिविरों या ऊंचे स्थानों की ओर पलायन करने को मजबूर हो जाते हैं।
कहा जाता है कि जब बिहार में जगन्नाथ मिश्र की सरकार थी और नेपाल में भयंकर प्राकृतिक आपदा आई थी, तब बिहार भीषण बाढ़ की चपेट में आया था। उस समय उन्होंने यह चिंता व्यक्त की थी कि नेपाल में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं से बिहार को बचाने के लिए स्थायी समाधान पर विचार करना होगा,लेकिन उस चिंता के बाद कई दशक गुजर गए। बिहार में अनेक सरकारें आईं और चली गईं, मगर बाढ़ का स्थायी समाधान आज भी दूर की कौड़ी बना हुआ है।
सवाल यह है कि आखिर बिहार कब तक हर साल बाढ़ की प्रतीक्षा करेगा और कब तक सरकार राहत एवं बचाव के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करती रहेगी?
हर साल बाढ़ से पहले प्रशासन सक्रिय होता है। बालू की बोरियां भरी जाती हैं, तटबंधों की मरम्मत होती है, संवेदनशील स्थलों पर निगरानी बढ़ाई जाती है और आपदा प्रबंधन की तैयारियां शुरू होती हैं। लेकिन कई बार पानी का तेज बहाव इन अस्थायी उपायों को अपने साथ बहा ले जाता है। फिर वही प्रक्रिया अगले वर्ष दोहराई जाती है।
यह व्यवस्था कब तक चलेगी?
राहत के नाम पर खर्च और स्थायी समाधान का अभाव
बाढ़ राहत और बचाव के लिए सरकार द्वारा खर्च किया जाने वाला पैसा जनता के टैक्स से आता है। तटबंधों की मरम्मत, बालू की बोरियां, अस्थायी सड़कें, राहत सामग्री और अन्य व्यवस्थाएं आवश्यक हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या हर वर्ष केवल मरम्मत और राहत पर पैसा खर्च करने से समस्या का समाधान हो सकता है?
बाढ़ प्रभावित इलाकों में अक्सर यह शिकायत सुनने को मिलती है कि आपदा के दौरान सरकारी तंत्र, ठेकेदार और बिचौलियों की भूमिका बढ़ जाती है।
केवल राहत नहीं, पुनर्वास की नीति बने
बिहार सरकार को अब बाढ़ प्रबंधन की अपनी नीति पर गंभीरता से पुनर्विचार करना चाहिए,जो गांव हर वर्ष बाढ़ से प्रभावित होते हैं, वहां रहने वाले लोगों के लिए दीर्घकालीन पुनर्वास योजना बनाई जानी चाहिए। सुरक्षित एवं ऊंचे स्थानों पर योजनाबद्ध तरीके से आवासीय बस्तियां विकसित की जा सकती हैं। लोगों को बेहतर सड़क, विद्यालय, स्वास्थ्य केंद्र, बिजली, पेयजल और रोजगार की सुविधा देकर स्वैच्छिक पुनर्वास के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।वहीं पुराने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को वैज्ञानिक तरीके से कृषि उपयोग में लाने की योजना बनाई जा सकती है। नदी का अपना प्राकृतिक प्रवाह होता है। यदि नदी के रास्ते में अनियोजित निर्माण होंगे या जल निकासी के प्राकृतिक मार्ग बंद होंगे तो किसी न किसी स्थान पर पानी अपना रास्ता बनायेगा,इसलिए नदी प्रबंधन को समग्र दृष्टिकोण से देखना होगा। जलग्रहण क्षेत्र, जल निकासी, गाद प्रबंधन, तटबंध, नदी की धारा और बाढ़ के मैदान—सभी को एक साथ ध्यान में रखना होगा।
भारत-नेपाल के बीच साझा रणनीति जरूरी
बिहार की बाढ़ की समस्या को केवल बिहार सरकार के स्तर पर हल करना कठिन है। नेपाल से निकलने वाली नदियां और हिमालयी क्षेत्र में होने वाली भारी वर्षा, भूस्खलन तथा अचानक आने वाले जलप्रवाह का सीधा प्रभाव बिहार पर पड़ता है।
इसलिए भारत और नेपाल के बीच बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली को और मजबूत करना होगा। नेपाल और भारत के विशेषज्ञों की संयुक्त समितियां बनाकर नदी घाटियों का अध्ययन किया जाना चाहिए। केवल आपदा आने के बाद बैठक करने की जगह पूरे वर्ष संयुक्त निगरानी और वैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए।
1978 से 2026 तक एक ही सवाल
1978, 1993, 2008, 2017, 2025 और अब 2026—नेपाल और हिमालयी क्षेत्र में आई विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव किसी न किसी रूप में बिहार तक पहुंचता रहा है, हर बड़ी घटना के बाद सरकारें तैयारियों की समीक्षा करती हैं, लेकिन कुछ समय बाद व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौट जाती है।
पश्चिम चंपारण के बगहा और आसपास के क्षेत्रों से लेकर बेतिया, गोपालगंज, सीतामढ़ी, शिवहर, वैशाली और मुजफ्फरपुर तक उत्तर बिहार का बड़ा भूभाग बाढ़ के खतरे से जूझता है। उत्तर प्रदेश के कुशीनगर और गोरखपुर जैसे इलाके भी नदियों के बढ़ते जलस्तर से प्रभावित होते हैं।
हजारों गांवों के लोगों के लिए बाढ़ केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि हर वर्ष लौटने वाला संकट है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चिंता
आज हिमालय तेजी से बदल रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान और वर्षा के पैटर्न में बदलाव हो रहा है। ग्लेशियरों के पिघलने और हिमनद झीलों से जुड़े जोखिमों पर वैज्ञानिक लगातार चिंता व्यक्त करते रहे हैं।
ऐसी परिस्थितियों में भविष्य में अचानक और अत्यधिक जलप्रवाह की घटनाओं का जोखिम गंभीर हो सकता है। इसलिए बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए आपदा प्रबंधन की पुरानी सोच पर्याप्त नहीं होगी।
अब पंचवर्षीय योजना की जरूरत
बिहार सरकार को केंद्र सरकार के सहयोग से बाढ़ नियंत्रण के लिए एक दीर्घकालीन पंचवर्षीय योजना बनानी चाहिए। योजना का लक्ष्य केवल अगले मानसून तक तटबंध बचाना नहीं, बल्कि अगले 25-30 वर्षों में बाढ़ के जोखिम को लगातार कम करना होना चाहिए।
इस योजना में नदी-घाटी आधारित अध्ययन, तटबंधों का वैज्ञानिक सुदृढ़ीकरण, जल निकासी, पुनर्वास, बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली, नेपाल के साथ समन्वय, आपदा प्रशिक्षण और पारदर्शी वित्तीय निगरानी को शामिल किया जाना चाहिए।
बिहार को हर साल बाढ़ आने के बाद राहत बांटने वाला राज्य नहीं, बल्कि बाढ़ आने से पहले जोखिम कम करने वाला राज्य बनना होगा।आखिर सवाल गरीब और निरीह जनता का है। वह हर वर्ष अपना घर, फसल, पशु और रोजगार खोकर सरकार की ओर सहायता के लिए टकटकी लगाए रहती है। सरकार भी हर वर्ष राहत पहुंचाती है और करोड़ों रुपये खर्च करती है।
लेकिन यदि वही संकट अगले वर्ष फिर लौटना है तो यह राहत व्यवस्था आखिर कब तक चलेगी?
बिहार को अब राहत की राजनीति नहीं, स्थायी समाधान की नीति चाहिए। जनता के टैक्स के पैसे का इस्तेमाल हर साल बाढ़ के बाद नुकसान भरने में करने के बजाय ऐसी व्यवस्था बनाने में होना चाहिए जिससे नुकसान की संभावना ही कम हो।
अब समय आ गया है कि बिहार और केंद्र सरकार मिलकर यह संकल्प लें कि आने वाली पीढ़ियों को हर साल बाढ़ और राहत के उसी चक्र में नहीं धकेला जायेगा।बाढ़ आयेगी या नहीं, यह पूरी तरह हमारे हाथ में नहीं है; लेकिन बाढ़ आने पर बिहार कितना डूबेगा और कितनी तबाही होगी—इसे कम करना निश्चित रूप से हमारे हाथ में है।