बिहार में गन्ना खेती की संभावनाएँ, चुनौतियाँ और किसानों की आर्थिक स्थिति

*एक हेक्टेयर गन्ना की खेती पर लगभग ₹1.40 से ₹1.80 लाख तक लागत आती है, जबकि अच्छी उपज मिलने और समय पर भुगतान होने पर ₹2.50 से ₹3.50 लाख तक की आय की संभवना होती है। इस प्रकार किसान को लगभग ₹80 हजार से ₹1.50 लाख प्रति हेक्टेयर तक शुद्ध लाभ मिल सकता है*


डाॅ.अरविंद नाथ तिवारी
बिहार कृषि प्रधान राज्य है और यहाँ गन्ना प्रमुख नकदी फसलों में से एक माना जाता है। विशेष रूप से तिरहुत और सारण प्रमंडल के जिलों में बड़ी संख्या में किसान गन्ना की खेती पर निर्भर हैं। पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सीवान, समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर जैसे क्षेत्रों में गन्ना ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बना हुआ है। चीनी उद्योग, गुड़ निर्माण तथा एथेनॉल उत्पादन के कारण गन्ना का महत्व लगातार बढ़ रहा है।गन्ना की खेती के लिए उपजाऊ दोमट मिट्टी, पर्याप्त सिंचाई और गर्म जलवायु उपयुक्त मानी जाती है। बिहार में सामान्यतः फरवरी-मार्च तथा सितंबर-अक्टूबर में गन्ना की बुवाई की जाती है। किसान उन्नत किस्मों के बीज, जैविक खाद, संतुलित उर्वरक, समय पर सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण अपनाकर अच्छी उपज प्राप्त करते हैं। यदि वैज्ञानिक तरीके से खेती की जाए तो प्रति हेक्टेयर 700 से 900 क्विंटल तक उत्पादन संभव है। ड्रिप सिंचाई, यंत्रीकरण तथा रोग-कीट नियंत्रण से लागत कम और उत्पादन अधिक किया जा सकता है।


गन्ना की खेती किसानों के लिए नकद आय का प्रमुख स्रोत माना जाता है। सामान्य परिस्थितियों में एक हेक्टेयर गन्ना की खेती पर लगभग ₹1.40 से ₹1.80 लाख तक लागत आती है, जबकि अच्छी उपज मिलने और समय पर भुगतान होने पर ₹2.50 से ₹3.50 लाख तक की आय की संभवना होती है। इस प्रकार किसान को लगभग ₹80 हजार से ₹1.50 लाख प्रति हेक्टेयर तक शुद्ध लाभ मिल सकता है। जिन किसानों की सिंचाई व्यवस्था बेहतर है और जो उन्नत तकनीक अपनाते हैं, उनकी आय इससे भी अधिक हो सकती है।हालांकि हर किसान को समान लाभ नहीं मिल पाता। खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। मजदूरी, उर्वरक, डीजल, बिजली और परिवहन खर्च में वृद्धि से उत्पादन महंगा हो गया है, कई बार चीनी मिलों द्वारा गन्ना का भुगतान समय पर नहीं होने से किसानों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है, यदि उत्पादन कम हो जाए या भुगतान में अधिक विलंब हो, तो किसान को प्रति हेक्टेयर ₹20 हजार से ₹60 हजार तक का आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। छोटे और सीमांत किसानों पर इसका प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है।पिछले एक दशक में बिहार के गन्ना किसानों की आर्थिक स्थिति मिश्रित रही है। सकारात्मक पक्ष यह है कि राज्य में गन्ना का क्षेत्रफल और उत्पादन बढ़ा है तथा एथेनॉल नीति के कारण चीनी उद्योग को नई दिशा मिली है। दूसरी ओर लागत में लगातार वृद्धि, मौंसम की अनिश्चितता, समय पर भुगतान की समस्या तथा कई क्षेत्रों में सिंचाई की कमी ने किसानों की आय पर दबाव बनाया है। बड़े किसान अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं, जबकि छोटे किसान अभी भी ऋण, लागत और विपणन संबंधी चुनौतियों से जूझ रहे हैं।

बिहार सरकार गन्ना किसानों को कई प्रकार की सहायता उपलब्ध करा रही है। उन्नत बीजों का वितरण, बीज अनुदान, कृषि यंत्रों पर सब्सिडी, सिंचाई योजनाएँ, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, किसान सलाहकारों के माध्यम से तकनीकी मार्गदर्शन तथा गन्ना विकास कार्यक्रम किसानों के लिए लाभकारी सिद्ध हो रहे हैं। राज्य सरकार गन्ना मूल्य भुगतान की निगरानी भी करती है और मिलों को समय पर भुगतान करने के निर्देश देती रहती है।केंद्र सरकार भी किसानों को अनेक योजनाओं के माध्यम से सहयोग प्रदान कर रही है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत पात्र किसानों को प्रतिवर्ष आर्थिक सहायता मिलती है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, सूक्ष्म सिंचाई योजनाएँ तथा एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम ने गन्ना क्षेत्र को नई संभावनाएँ दी हैं। एथेनॉल उत्पादन बढ़ने से चीनी मिलों की आय में विविधता आई है, जिससे भविष्य में किसानों के भुगतान की स्थिति और बेहतर होने की उम्मीद है।तिरहुत प्रमंडल बिहार के गन्ना उद्योग का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है। यहाँ छह प्रमुख चीनी मिल संचालित होती है, इनमें पश्चिम चंपारण की बगहा, रामनगर, लौरिया, नरकटियागंज और मझौलिया चीनी मिलें तथा पूर्वी चंपारण की सुगौली चीनी मिल शामिल हैं। इन मिलों से हजारों किसान प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं और लाखों लोगों की आजीविका इस उद्योग पर निर्भर रहती है।इन चीनी मिलों का किसानों के प्रति रवैया अलग-अलग परिस्थितियों में भिन्न रहा है। अधिकांश मिलें गन्ना सर्वेक्षण, पर्ची वितरण, तौल व्यवस्था, परिवहन सुविधा और तकनीकी सलाह उपलब्ध कराती हैं। कई मिलों ने आधुनिक मशीनें लगाई हैं और किसानों को उन्नत किस्मों की खेती के लिए प्रेरित किया है। लेकिन किसानों की प्रमुख शिकायत समय पर भुगतान, तौल में पारदर्शिता, गन्ना आपूर्ति पर्ची की उपलब्धता तथा लंबित बकाया को लेकर रही है,जब भुगतान में विलंब होता है ,तो किसानों की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है और उन्हें खेती के अगले चक्र के लिए ऋण भी लेना पड़ता है।

भविष्य की दृष्टि से मोतीपुर और मड़वन में नई चीनी इकाइयों के शुरू होने से तिरहुत क्षेत्र के गन्ना उद्योग को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है। इससे गन्ना पेराई क्षमता बढ़ेगी, किसानों को निकटवर्ती मिलों में गन्ना आपूर्ति का अवसर मिलेगा, परिवहन लागत कम होगी और रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे। यदि नई इकाइयाँ समय पर भुगतान, आधुनिक तकनीक और एथेनॉल उत्पादन पर विशेष ध्यान दें, तो पूरे क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बड़ा लाभ मिल सकता है।कुल मिलाकर बिहार में गन्ने की खेती आज भी किसानों के लिए लाभकारी व्यवसाय बन सकती है, बशर्ते खेती वैज्ञानिक तरीके से की जाय, लागत को नियंत्रित किया जाय और चीनी मिलें समय पर भुगतान सुनिश्चित करें। सरकार, चीनी उद्योग और किसानों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होने पर बिहार का गन्ना उद्योग देश के अग्रणी कृषि-औद्योगिक क्षेत्रों में अपनी मजबूत पहचान बना सकता है।

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