सन्देह का झाड़ू———————
सन्देह का झाड़ू———————

रचनाकार-डॉ ओमप्रकाश द्विवेदी ओम
सन्देह का झाड़ू चल जाता है तो,
सारे रिश्ते जग के बुहर जाते हैं।
नाजुक रिश्ते भी नाजुक कलि से तो,
कदरज सह उसमें बुहर जाते हैं।
तब कशिश कोशिश भी थम जाती है,
असुवन की वारिस होने लगती है।
दिलों दिमाग भव चक्कर में फंसता है,
घिरनी सा नाचता रहता वह है।
नाजुक रिश्ते अति नाजुक हो,
जोड़ छोड़ गांठ ढ़ूढ़ने लगते हैं।
पुनश्च समपटल रूप देना कठिन हो,
विकिरण का शिकार हो जाते हैं।
सन्देह के जादू की मार को,
प्रेम वाक् ही नेश्तनाबूत करता है।
प्रेम वह औषधि है जो जीवन को,
रिश्ते संजोय जान डाल देता है।
यह सृष्टि की सुन्दर नयन सखे,
जो मिली-जुली संस्कृति झलकाती है।
समय चाल चलन चल कर देखें,
मन्द मधुर मुस्कान मन देता है।
अपयशी असहज अस्वभाविक पल को,
इन्दीवर सम शैवाल ढ़क दूर करता है।
सन्देह प्रदत्त असहज पल को,
प्रेम सरित सरस प्रवाह धुलता है।।
डॉ ओमप्रकाश द्विवेदी ओम पडरोना कुशीनगर
१२-७-२६ समय प्रातः काल ७-०० से ७-४१ मध्य लिखा।
राम राम जी।