बिहार में एमडीएम से वंचित हो रहे छात्र,स्वच्छता हो रही धाराशायी

ग्रामीणो के शैक्षिक अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इससे सीधा नुकसान गरीब बच्चों का हो रहा है और सरकारी पैसे का दुरुपयोग हो रहा है

शिक्षक पंडित रमेश मिश्र

आधुनिक युग में शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है ,लेकिन वर्तमान परिपेक्ष में शिक्षा व्यवस्था ,उसमें भी बिहार के शिक्षा व्यवस्था सिर्फ और सिर्फ आंकड़ों में बेहतर स्थिति में दिखलाई जाती है, इससे सबसे अधिक प्रभावित बिहार के लगभग 80% गरीब बच्चे हैं ,जो ग्रामीण इलाकों से आते हैं। बात चाहे एमडीएम की हो या फिर सफाई, चौकीदार, किताब , बेंच डेस्क सभी की आपूर्ति गैर सरकारी संगठनों के द्वारा वर्तमान में सरकार द्वारा किया जा रहा है, इन सभी आपूर्तिकर्ता गैर सरकारी संगठनों को इन सभी कार्यों के लिए ,या तो सरकार से सीधे भुगतान किया जाता है ,या तो विद्यालय में करना होता है । ग्रामीणो के शैक्षिक अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि इससे सीधा नुकसान गरीब बच्चों का हो रहा है और सरकारी पैसे का दुरुपयोग हो रहा है। सर्वप्रथम बात करते हैं एमडीएम के तमाम विद्यालयों में एमडीएम गैर सरकारी संगठनों द्वारा किया जाता है ।

एक ही एनजीओ को 50 से ऊपर विद्यालयों के एमडीएम आपूर्ति का जिम्मा है ऐसे में गुणवत्ता और मात्रा के शत प्रतिशत शुद्धता की बात करना बेमानी है सरकार जब चाहे जांच कर ले, जिन विद्यालयों में गैर सरकारी संगठनों द्वारा एमडीएम आपूर्ति की जाती है उन विद्यालयों के 70% छात्र एमडीएम नहीं खाते, दूसरे नंबर पर सफाई वर्तमान में बिहार के सभी विद्यालयों की सफाई का जिम्मा विभिन्न गैर सरकारी संगठनों के पास है सफाई की भी वही स्थिति है जो नगर परिषद के सफाई की स्थिति है ,क्योंकि वहां भी सफाई का मोर्चा सरकारी संगठन संभाले हुए हैं। विद्यालयों के सफाई कर्मी का भुगतान प्रक्रिया अलग-अलग है प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों के सफाई कर्मी का भुगतान शिक्षा विभाग गैर सरकारी संगठनों को करती है और गैर सरकारी संगठन सफाई कर्मी की इस प्रकार माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों को मोटी रकम, जो सरकार द्वारा निर्धारित है ।गैर सरकारी संगठनों को करना पड़ता है और गैर सरकारी संगठन सफाई कर्मी को ₹3000रुपया दो हार्पिक ,दो झाड़ू की आपूर्ति करते हैं ,ना भुगतान समय से होता है ना सफाई कर्मी आते हैं ।परिणाम स्वरुप सारे विद्यालयों में बात चाहे शौचालयों की हो या फिर परिषर की, सब कुछ ना के बराबर है।

विद्यालयों के शिक्षक और प्रधानाध्यापकों के दबाव पर सफाई कर्मियों का एक ही जवाब इतने महीने से वेतन नहीं मिला। गैर सरकारी संगठनों से संपर्क करने पर सीधा जवाब की मेरा इतने महीने से भुगतान नहीं हुआ। एमडीएम और सफाई यह दोनों दैनिक हैं और इससे ग्रामीण इलाके के गरीब बच्चे दोनों सबसे अधिक प्रभावित हैं। वर्तमान परिस्थिति और प्रक्रिया के कारण विभिन्न स्तरों के निरीक्षी पदाधिकारी कुछ नहीं कर पाते।सरकार को इस महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे पर अभिलंब ध्यान देना चाहिए। गैर सरकारी संगठनों के माध्यम से कार्य संस्कृति से जहां काम करने वालों को समुचित मजदूरी नहीं मिलता और बड़े पैमाने पर रोजगार का अवसर समाप्त हो रहा है। वहीं विद्यालयों में अध्यनरत ग्रामीण परिवेश के मजदूरा वर्ग के होनाहार बच्चे गुणवत्तापूर्ण भोजन और सफाई की समस्याओं से जूझ रहे हैं। विद्यालय प्रधानाचार्य गैर सरकारी संगठनों से सरकार को विभाग को और गैर सरकारी संगठनों के कमी से तालमेल बैठाने और विभिन्न प्रतिवेदनों तक सिमट कर रह गए हैं ,ऐसे में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात करना बेमानी है।

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