संपूर्ण क्रांति दिवस पर कविता

*संपूर्ण क्रांति दिवस पर कविता* 

_5 जून 1974 – संपूर्ण क्रांति का शंखनाद_

रचना डॉ अनमोल कुमार


बिहार की माटी का वो लाल, 
अन्याय के आगे हुआ न हलाल। 
अंग्रेज गए पर कुर्सी के चोर, 
जनता भूखी, नेता सिरमौर। 
तब पटना के गांधी मैदान से, 
एक सिंह दहाड़ा – “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है”।


नाम था जयप्रकाश, काम प्रकाश सा, 
भ्रष्टाचार के तम में वो बन गया उजास सा। 
न सत्ता का लोभ, न पद का मोह, 
त्याग-मूर्ति ने दिया नया विग्रह। 
बोले – आधी क्रांति नहीं, चाहिए पूरी, 
“संपूर्ण क्रांति”से बदले तस्वीर अधूरी।


संपूर्ण क्रांति क्या है? जेपी ने समझाया, 
सिर्फ सरकार बदलना नहीं, समाज को बदलना है भाया। 
राजनीतिक शुचिता, आर्थिक बराबरी, 
सामाजिक न्याय, शैक्षिक सवारी। 
नैतिक मूल्य, सांस्कृतिक चेतना, 
हर व्यवस्था की हो अपनी प्रेरणा। 
सात सूत्र में बाँध दिया, भारत का सपना।


छात्र उठे, युवा दौड़े, मजदूर गरजे, 
बिहार से उठी लहर, दिल्ली तक बरसे। 
इंदिरा की तानाशाही, आपातकाल की काली रात, 
लोकनायक ने दी मशाल, तोड़ी हर दीवार-लात। 
जेल गए, लाठी खाई, पर झुके नहीं, 
कह गए – *”भय बिन होय न प्रीत”*, तानाशाह रुके नहीं।
आज फिर वही सवाल खड़ा है, 
भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, नैतिकता पड़ा है। 
कुर्सी की लड़ाई, सिद्धांतों की हार, 
जेपी पूछ रहे – कहाँ गई वो संपूर्ण क्रांति की पुकार?

संकल्प
आओ जेपी को फिर से जियें, 
वोट से पहले विवेक को सींचें। 
जात-पात, धर्म-भाषा से ऊपर उठें, 
भ्रष्ट नेता को सत्ता से हटाएँ। 
छात्र शक्ति ही राष्ट्र शक्ति है, 
यही संपूर्ण क्रांति की अभिव्यक्ति है। 
सिंहासन खाली करो कि जनता जागती है – 
हर युग में ये नारा आग सी लगती है।



समापन पंक्ति
“लोकनायक मरे नहीं, विचार मरा नहीं करते, 
जब-जब सिंहासन डोले, जेपी जिंदा हो जाते हैं।”

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