भारतीय संविधान का निर्माता आम्बेडकर या बीएन राव


लेखक – प्रो.अरविंद नाथ तिवारी
आजकल सोशल साइट्स पर संविधान निर्माण पर काफी बहस लोगों बीच चल रहा है,कोई आम्बेडकर को निर्माण कर्ता बतला रहा है,तो कोई बी एन राव को,दोनों पक्ष एक दुसरे का आलोचना कर रहा है,दोनों पक्ष अर्ध्य सत्य जान जान रहें हैं,पूर्ण सत्य जानते तो आलोचना नहीं करते,आइए कैसे अर्ध्य जानते हैं,मैं इस आलेख में बताने जा रहा हूं,क्योंकि देश को जानना जरूरी है,पहले यह जानिए कि इंग्लैंड की सरकार के आदेश पर भारतीय संविधान निर्माण करने की योजना पर इंगलैण्ड से केबिनेट मिशन 1946 में भारत आया था।  केबिनेट मिशन योजना के अनुसार “संविधान सभा” के सदस्यों की संख्या 389 रखी गई जिनमें से 296 प्रतिनिधि ब्रिटिश प्रान्तों से और 93 प्रतिनिधि देशी राज्यों से रखे जाने की व्यवस्था की गई।संविधान सभा का प्रथम अधिवेशन -डा० सच्चिदानन्द सिन्हा की अध्यक्षता में 9 दिसम्बर 1946 को दिल्ली में कई गयी, इसमें मुस्लिम लीग के सदस्यों ने भाग नही लिया, क्योंकि उनके विचार में भारत में दो राष्ट्र थे, एक हिन्दुओं का तथा दूसरा मुसलमानों का । इसलिये उनके विचार में इन दोनों राष्ट्रों के लिये पृथक-पृथक मंविधान सभायें होनी चाहियें थीं, इसका परिणाम यह हुआ कि केवल राष्ट्रीय मुस्लमान ही इस संविधान सभा में सम्मिलित हुए तथा इस बैठक में डा० सच्चिदानंद सिन्हा को संविधान निर्मात्री सभा का अस्थायी अध्यक्ष नियुक्त किया गया तथा बाद में 11 दिसम्बर 1946 को डॉ.राजेद्र प्रसाद को इस सभा का स्थायी अध्यक्ष चुन लिया गया और वे अन्त तक इसके अध्यक्ष बने रहे। डॉ० बी० एन० राव को इस संविधान सभा का संवैधानिक सलाहकार (Constitution Adviser) नियुक्त किया गया । 13 दिसम्बर, 1946 को श्री जवाहर लाल नेहरू ने अपना प्रसिद्ध उद्देश्य प्रस्ताव (Objective Resolu-tion)संविधान सभा में प्रस्तुत किया और संविधान सभा की वैधानिक आधारशिला रखी। इस उद्देश्य प्रस्ताव को 22 जनवरी 1947 को पारित किया गया। इस उद्देश्य प्रस्ताव में सवि-धान सभा ने निम्नलिखित उद्देश्य निर्धारित किया –
पहला “भारत एक पूर्णतया स्वतन्त्र और पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न गणराज्य होगा जिसके द्वारा स्वयं अपने संविधान का निर्माण किया जायेगा।” दुसरा “इस समय ब्रिटिश भारत कहे जाने वाले क्षेत्र, भारतीय रियासतों में आने वाले क्षेत्र और ब्रिटिश भारत तथा रियासतों के बाहर के ऐसे अन्य क्षेत्र, जो स्वतन्त्र प्रभुःव-सम्मन्न भारत में सम्मिलित होना चाहते हैं, सब मिलकर एक संघ मानेंगे।”तिसरा उद्देश्य प्रस्ताव में कहा गया कि, “ये तथाकथित क्षेत्र अपनी वर्तमान सीमाओं में अथवा संविधान द्वारा निश्चित की गई सीमाओं में संविधान द्वारा की गई व्यवस्था के अनुवार स्वायत्तशासी ही इकाइयाँ होंगे, जिन्हें अपशिष्ट अधिकार प्राप्त होंगे और यह उन अधिकार तथा कार्यों को छोड़कर, जो केन्द्र में निहित अथवा उसे सौपे गये हों। शासन तथा प्रशासन के सभी अधिकार तथा कार्यों का पालन करेंगे।”चौथा “जनता ही भारतीय संघ तथा उसके अन्तर्गत विविध राज्यों में समस्त राज्य शक्ति का स्रोत होगी।”पांचवा “भारत के नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय, प्रदनिर्माण और कार्य की स्वतन्त्रता, कानून और सार्वजनिक नैतिकता के अधीन प्राप्त होगी।”(vi) “अल्पसंख्यक वर्गों, पिछड़ी जातियों एवं कबाइली जातियों के हितों की रक्षा की समुचित व्यवस्था की जायेगी।”(vii) ‘भारत राज्य क्षेत्र की अखण्डता और भूमि, जल तथा वायु पर उसकी सम्प्रभुता की, रक्षा, न्याय तथा सभ्य राष्ट्रों के कानूनों के अनुगार की जायेगी।”(viii) “यह प्राचीन देश विश्व में अपना अधिकार और सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त करता है और विश्व शान्ति तथा मानव जाति के कल्याण में अपना पूर्ण और स्वैच्छिक योग देता रहेगा।”उपरोक्त उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत करते समय श्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा था, “इस प्रस्ताव में हमारी वे आकांक्षायें व्यक्त की गई हैं, जिनके लिये हमने इतने कठोर संघर्ष किये हैं। संविधान सभा इन्हीं उद्देश्यों के आधार पर हमारे सविधान का निर्माण करेगी।” वस्तुतः भारतीय संविधान के निर्माण में इस प्रस्ताव का वही महत्व है जो अमरीकी संविधान के लिये स्वतन्त्रता की घोषणा का है। श्री के० एम० मुन्शी ने इस उद्देश्य प्रस्ताव के विषय में कहा था, “नेहरू का उद्देश्य सम्बन्धी यह प्रस्ताव ही हमारे स्वतन्त्र गणराज्य की जन्म कुण्डली है।”
संविधान निर्मात्री सभा की समीक्षा (Criticism of Constituent Assembly)संविधान निर्मात्री सभा की अनेक विचारकों एवं नेताओं द्वारा आलोचना की गई थी। उसके गठन एवं क्रिया-प्रक्रिया के सम्बन्ध में अनेक प्रकार की टिप्पणी की गई, जिनमें से प्रमुख इस प्रकार हैं- भारतीय संविधान निर्मात्री सभा की वैज्ञानिक स्थिति के सम्बन्ध में अनेक प्रकार से टिप्पणी की गई थी।
संविधान सभा द्वारा संविधान-निर्माण एक निश्चित प्रक्रिया द्वारा किया गया तथा संविधान निर्माण की यह प्रक्रिया विभिन्न स्तरों से होती हुई अपनी मंजिल तक पहुंची । संविधान-निर्माण की इन विभिन्न अवस्थाओं का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है—–
नवीन संविधान का प्रथम प्रारूप संविधान सभा के कार्यालय द्वारा तैयार किया गया, जिसका निर्देशन संविधान सभा के सवैधानिक सलाहकार डा० बी० एन० राव ने किया। इस प्रारूप को तैयार करने के लिये सर्वप्रथम इस सभा के कार्यालय ने 60 देशों के महत्वपूर्ण तथ्यों को 3 ग्रन्थों में प्रकाशित किया। बी० एन० राव को इस कार्य के लिये सन् 1947 के अन्तिम तीन महीनों में विदेशों में यात्रा करनी पड़ी तथा इन यात्राओं के प्रतिवेदन के रूप में अपने महत्वपूर्ण तथ्य-विचार रखें । संविधान का द्वितीय प्रारूप प्रारूप समिति द्वारा निर्मित (Second Draft of Constitution-Prepared by Draft Committee) – संविधान का प्रथम प्रारूप, जिसे संविधान सभा के कार्यालय द्वारा निर्मित किया गया था, जब प्रकाशित किया गया तब उसकी टीका-टिप्पणी हुई, आलोचना हुई तथा अनेक सुझाव भी आये । इन आलोचनाओं एवं सुझावों को समायोजित करने तथा विचार-विमर्श करने के उपरान्त संविधान सभा के सम्मुख प्रस्तुत करने के लिये एक प्रारूप समिति को सौंप दिया गया। इस समिति ने आलोचनाओं, सुझावों आदि की दृष्टि से समुचित,परिवर्तन करके तथा स्पष्टीकरण सहित संशोधित एवं मुद्रित कराकर संविधान सभा के अध्यक्ष को 27 अक्टूबर 1948 को सौंप दिया । इस प्रारूप की प्रकाशित प्रतियाँ संविधान सभा के सदस्यों को भी प्रदान की गई। संविधान सभा में इस द्वितीय एवं संशोधित प्रारूप पर 4 नवम्बर, 1948 से विचार-विमर्श आरम्भ हुआ। इस संशोधित एवं समायोजित द्वितीय प्रारूप के सम्बन्ध में प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ० अम्बेदकर ने कहा था कि, “प्रारूप समिति ने एक मौलिक प्रलेख तैयार करने के बजाय विद्यमान परिस्थितियों में एक व्यावहारिक प्रलेख तैयार करने की चेष्टा की ।”इस प्रकार प्रारूप समिति द्वारा प्रस्तुत यह द्वितीय प्रारूप समस्त टीका टिप्पणियों, आलोचनाओं एवं सुझावों पर विचार-विमर्श करके संविधान सभा में प्रस्तुत किया गया।उल्लेखनीय है कि ब्रिटिश संविधान आदि में कुछ जोड़ने के लिये अथवा संवैधानिक महत्व का कोई कानून पारित करते समय इगलैण्ड में यह परम्परा है कि उस विधेयक की प्रत्येक धारा पर पर्याप्त वाद-विवाद एवं विचार-विमर्श हो । संविधान सभा द्वारा भी ब्रिटेन की इस परम्परा का पालन किया गया और संविधान सभा द्वारा द्वितीय प्रारूप की प्रत्येक धारा पर व्यापक रूप से वाद-विवाद हुआ। 15 नवम्बर, 1948 से 17 अक्टूबर, 1949 तक इस प्रारूप पर वाद-विवाद हुआ जिसमें सभी वर्गों हितों तथा सदस्यों को अपने विचार प्रस्तुत करने का पूर्ण अवसर प्रदान किया गया । संविधान सभा द्वारा इस विचार-विमर्श के द्वितीय वाचन के दौरान लगभग 7635 संशोधन प्राप्त किये गये तथा उनमें से 2,473 पर गम्भीरता पूर्वक विचार-विमर्श किया गया । इस प्रारूप की प्रत्येक धारा पर व्यापक विचार-विमर्श करने के उप्रान्त प्रस्तावना पर विचार-विमर्श करके उसे स्वीकार किया गया । संविधान सभा के अन्तर्गत हुए इस विचार-विमर्श की एक बहुत बड़ी विशेषता यह थी कि इस सभा में प्रस्तुत सभी विषयों एवं प्रश्नों पर सर्वसम्मत्ति से निर्णय लिये गये तथा प्रत्येक वर्ग एव प्रतिनिधि के विचारों को समुचित सम्मान दिया गया । दसवें अधिवेशन के उपरास्त प्रारूप समिति को पुनः एक बार द्वितीय वाचन के दौरान आये सुझावों पर विचार करने तथा वर्तनी, विराम चिन्हों आदि की दृष्टि से संविधान में परिवर्तन कर सशोधित एवं परिमार्जित रूप में प्रस्तुत प्रारूप समिति ने 17 अक्टूबर, 1949 से 3 नवम्बर, 1949 तक पुनः इस संविधान के प्रारूप पर विचार-विमर्श किया तथा अपना प्रतिवेदन अन्तिम रूप से संविधान सभा के अध्यक्ष के सम्मुख प्रस्तुत किया। 14 नवम्बर, 1949 से 17 नवम्बर 1949 तक संविधान सभा ने संविधान प्रारूप का तीसरा वाचन पूर्ण किया। इस तीसरे वाचन के उपरान्त प्रारूप समिति के अध्यक्ष डा० अम्बेडकर द्वारा संविधान सभा द्वारा निर्णीत संविधान को पारित करने के लिये प्रस्ताव रखा गया। संविधान-प्रारूप को पारित करने का यह प्रस्ताव 26 नवम्बर, 1949 को संविधान सभा द्वारा सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया, तब संविधान सभा का 12वाँ अधिवेशन 4 जनवरी, 1950 को आमन्त्रित किया गया। इस अधिवेशन में 308 सदस्यों द्वारा भाग लिया गया। इस संविधान सभा के अधिवेशन में संविधान सभा के 308 सदस्यों ने संविधान पारित करने के लिये हस्ताक्षर किये ।इसी अवसर पर यह भी निर्णय लिया गया कि नवीन सविधान को 26 जनवरी, 1950 से लागू किया जाय तथा नवीन संविधान द्वारा स्थापित स्वतन्त्र एवं पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न ‘भारतीय संघ गणराज्य’ का प्रथम राष्ट्रपति डॉ० राजेन्द्र प्रसाद को बनाया जाये ।
इस प्रकार कैबिनेट मिशन द्वारा स्थापित संविधान सभा, जिसे भारतीय स्वाधीनता अधिनियम, 1947 के पारित होने पर पूर्ण प्रभुसत्ता प्राप्त हो गई थी, स्वतन्त्र भारत के लिये उपयोगी एवं व्यावहारिक प्रगतिशील एव गतिमय-विकासयुक्त सविधान का निर्माण किया जो भारत की समस्त कठिनाइयों से युक्त राजनैतिक संकटों, आपात स्थिति एवं युद्ध तक की संकटमय परिस्थितियों में भी खरा उतरा और उपयोगी सिद्ध हुआ ।


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