आए दीपोत्सव मनाया जाए

*डॉ अनमोल कुमार*
दीपोत्सव का अर्थ है – दीपों का उत्सव। यह केवल एक त्योहार नहीं, यह भारत की आत्मा है। जब अयोध्या में श्रीराम चौदह वर्ष के वनवास के बाद लौटे थे, तब पूरी अयोध्या ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। उसी दिन से यह परंपरा चली आ रही है कि अंधेरा कितना भी गहरा क्यों न हो, एक छोटा सा दीप उसे हरा सकता है।
दीपोत्सव क्यों मनाया जाए?
आज का समाज भाग-दौड़, तनाव और दिखावे में उलझ गया है। लोग एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। दीपोत्सव हमें फिर से जोड़ने का अवसर देता है। यह हमें सिखाता है कि –
अंधेरे पर उजाले की जीत बुराई कितनी भी बड़ी हो, अच्छाई का एक दीप काफी है।
पर्यावरण की रक्षा मिट्टी के दीये जलाना, यह हमारी मिट्टी से जुड़ाव है। यह कुम्हार के घर में भी दिवाली लाता है।
सामाजिक समरसता -दीपोत्सव अमीर-गरीब, छोटा-बड़ा नहीं देखता। दीप सबके घर एक जैसा जलता है।
आज का दीपोत्सव – बदलती तस्वीर
दुख की बात है कि आज दीपोत्सव का अर्थ बदल गया है। जहाँ पहले मिट्टी के दीये जलते थे, वहाँ अब बिजली की झालरें हैं। जहाँ पहले प्रेम की मिठाई बँटती थी, वहाँ अब पटाखों का शोर है। हमने दीपोत्सव को बाजार का उत्सव बना दिया है।
असली दीपोत्सव तो वह है, जब हम अपने भीतर का अहंकार, लालच और नफरत का अंधेरा मिटाएँ।
हम कैसा दीपोत्सव मनाएँ?
इस बार का दीपोत्सव ऐसा हो
एक दीया शहीदों के नाम का हो, जिन्होंने देश के लिए जान दी।- एक दीया उस किसान के नाम का हो, जो हमारे लिए अन्न उगाता है।- एक दीया उस गुरु के नाम का हो, जिसने हमें ज्ञान दिया।- एक दीया उस गरीब बच्चे के नाम का हो, जिसके घर में आज तक दीप नहीं जला।
जब हम किसी और के घर में रोशनी करेंगे, तभी हमारे घर की रोशनी सार्थक होगी।
दीपोत्सव मनाया जाए, पर ऐसा मनाया जाए कि अयोध्या से लेकर हर गाँव तक, हर दिल तक रोशनी पहुँचे। दीप जलाना तो आसान है, पर किसी के जीवन में दीप बन जाना ही सबसे बड़ा दीपोत्सव है। आओ, इस बार हम प्रण लें – पटाखा नहीं, प्रेम जलाएँगे। शोर नहीं, संस्कार जगाएँगे। दीपोत्सव मनाया जाए, मन का दीपोत्सव मनाया जाए।