*फरक्का जलसंधि पर जदयू का ‘नीतीश संवाद’*
*फरक्का जलसंधि पर जदयू का ‘नीतीश संवाद’*

*क्या पार्टी को डर है कि यदि उसके पास बिहार से जुड़े बड़े और भावनात्मक मुद्दे नहीं रहे तो वह राष्ट्रीय राजनीति में केवल सहयोगी दल बनकर रह जायेगी*

डाॅ.अरविंद नाथ तिवारी
#Narayaninews.in
भारत और बांग्लादेश के बीच 1996 में हुई गंगा जल संधि इस समय बिहार की राजनीति के केंद्र में आ गई है। संधि की 30 वर्ष की अवधि दिसंबर 2026 में समाप्त होने वाली है और इसके नवीनीकरण अथवा नई व्यवस्था को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। इसी बीच केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में सहयोगी जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने फरक्का जलसंधि को लेकर आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। पार्टी का कहना है कि भविष्य में होने वाली किसी भी जल संधि में बिहार के हितों और उसकी जल आवश्यकताओं को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।इसी मुद्दे को लेकर जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने 5 सितंबर से ‘नीतीश संवाद’ अभियान शुरू किया है। बड़ा सवाल यह है कि बिहार और केंद्र दोनों जगह सत्ता में साझेदार जदयू आखिर अब विरोध की राजनीति क्यों कर रही है? क्या यह केवल बिहार के जल अधिकारों की लड़ाई है या इसके पीछे आने वाले समय की राजनीतिक जमीन तैयार करने की रणनीति भी छिपी है?
बिहार के हित को केंद्र में लाने की कोशिश
संजय झा लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि बिहार की जल आवश्यकताओं की अनदेखी स्वीकार नहीं की जायेगी। 5 सितंबर को बक्सर में अभियान की शुरुआत करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान फरक्का व्यवस्था बिहार और देश के हित में नहीं है तथा भविष्य की किसी भी व्यवस्था में कम-से-कम वर्ष 2050 तक बिहार की जल आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए। यह मांग राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। बिहार गंगा के ऊपरी प्रवाह वाले हिस्से में स्थित है और राज्य की कृषि, पेयजल, सिंचाई तथा बाढ़ की समस्या सीधे नदी के प्रवाह और जल प्रबंधन से जुड़ी है, ऐसे में जदयू यदि फरक्का को बिहार की अस्मिता और अधिकार का प्रश्न बनाती है तो उसे जनता के बीच एक ऐसा मुद्दा मिलता है, जो जातीय समीकरणों से आगे जाकर व्यापक सामाजिक सरोकार से जुड़ सकता है।
यही जदयू की रणनीति का सबसे मजबूत पक्ष है।
लेकिन यक्ष प्रश्न—सत्ता में रहते हुए विरोध क्यों?
यहीं से राजनीतिक सवाल उठता है। जदयू केंद्र की मोदी सरकार की सहयोगी है और बिहार में भी एनडीए सरकार का हिस्सा है। ऐसे में केंद्र की किसी नीति के विरुद्ध राज्य की सत्तारूढ़ सहयोगी पार्टी का खुलकर अभियान चलाना सामान्य राजनीतिक घटनाक्रम नहीं माना जा सकता।8 सितंबर को बेगूसराय में ‘नीतीश संवाद’ के दौरान संजय झा का यह कहना कि “सत्ता रहे या ना रहे, बिहार के हित की बात हम नहीं छोड़ेंगे” इसी राजनीतिक संदेश को और स्पष्ट करता है। उनका तर्क यह है कि सत्ता से अधिक महत्वपूर्ण बिहार का हित है।
सहानुभूति की राजनीति का नया अध्याय
‘नीतीश संवाद’ केवल पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक नहीं है। इसकी राजनीतिक रूपरेखा बताती है कि जदयू इस मुद्दे को गांव-गांव और घर-घर तक ले जाना चाहती है। गंगा किनारे के 12 जिलों को अभियान में शामिल करना भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। इससे पार्टी एक साथ कई संदेश देना चाहती है।पहला—बिहार के जल अधिकारों की लड़ाई जदयू लड़ रही है।दूसरा—केंद्र में सहयोगी होने के बावजूद बिहार के हित पर वह समझौता नहीं करेगी।तीसरा—नीतीश कुमार की राजनीति को बिहार के हितों की राजनीति के रूप में स्थापित किया जायऔर चौथा—आने वाले राजनीतिक संघर्ष में भाजपा से अलग जदयू की स्वतंत्र जमीन तैयार की जाय।यही कारण है कि कुछ राजनीतिक विश्लेषक इस अभियान को केवल जल नीति का सवाल नहीं, बल्कि जदयू की राजनीतिक पुनर्स्थापना की कोशिश के रूप में भी देख रहे हैं।
हार में भी फायदा, जीत में भी फायदा
इस अभियान की सबसे दिलचस्प बात यह है कि जदयू को इसमें राजनीतिक रूप से दोनों स्थितियों में लाभ दिखाई देता है,यदि केंद्र सरकार नई जल संधि में बिहार की मांगों को स्वीकार करती है तो जदयू जनता के बीच यह कह सकती है कि उसकी राजनीतिक दबाव की रणनीति सफल हुई। तब पार्टी का संदेश होगा—बिहार की आवाज दिल्ली तक पहुंचाने और अधिकार दिलाने में जदयू सफल रही और यदि उसकी मांग पूरी तरह स्वीकार नहीं होती है, तो जदयू के पास यह कहने का अवसर रहेगा कि उसने बिहार के हित की लड़ाई लड़ी, लेकिन केंद्र ने उसकी बात नहीं मानी,इस तरह जीत भी जदयू की राजनीतिक पूंजी बन सकती है और असहमति भी।यही कारण है कि फरक्का का मुद्दा जदयू के लिए राजनीतिक रूप से अत्यंत उपयोगी दिखाई देता है।
भाजपा के लिए भी आसान नहीं है यह मुद्दा
जदयू के इस अभियान की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती भाजपा के सामने है। केंद्र सरकार के लिए भारत-बांग्लादेश संबंध केवल बिहार का विषय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का भी मामला है। 1996 की संधि दोनों देशों के बीच गंगा जल बंटवारे की व्यवस्था तय करती है और केंद्र सरकार को बिहार के साथ-साथ दूसरे राज्यों और भारत-बांग्लादेश संबंधों के व्यापक पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा,ऐसे में जदयू जितना इस मुद्दे को बिहार की भावनाओं से जोड़ेगी, भाजपा के लिए उतना ही कठिन होगा कि वह उसे केवल राजनीतिक बयानबाजी कहकर खारिज करे।दिलचस्प यह है कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संजय झा को आश्वस्त किया है कि संधि के नवीनीकरण से जुड़े फैसले में बिहार के हितों को ध्यान में रखा जायेगा। इससे जदयू को यह कहने का अवसर भी मिलता है कि उसकी आवाज केंद्र तक पहुंची है।
क्या जदयू अपना जनाधार बचाने की तैयारी कर रही है?
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न है।
क्या जदयू को यह चिंता है कि भाजपा के बढ़ते प्रभाव के बीच उसका पारंपरिक राजनीतिक जनाधार धीरे-धीरे कमजोर हो सकता है? क्या पार्टी को डर है कि यदि उसके पास बिहार से जुड़े बड़े और भावनात्मक मुद्दे नहीं रहे तो वह राष्ट्रीय राजनीति में केवल सहयोगी दल बनकर रह जायेगी?यदि ऐसा है तो फरक्का जलसंधि उसके लिए आदर्श मुद्दा है।
क्योंकि यह मुद्दा बिहार की भौगोलिक, आर्थिक और पर्यावरणीय चिंता से जुड़ा है। इसमें किसान हैं, बाढ़ है, सिंचाई है, पेयजल है और सबसे बढ़कर ‘बिहार के अधिकार’ की भावना है।जदयू इसी भावना को राजनीतिक संदेश में बदलना चाहती है। इस बार मुद्दा आर्थिक पैकेज का नहीं, बल्कि जल और भविष्य के बिहार के अधिकार का है।इसलिए ‘नीतीश संवाद’ को केवल एक राजनीतिक यात्रा मानना शायद अधूरा विश्लेषण होगा। यह जदयू द्वारा जनता के बीच अपनी स्वतंत्र आवाज स्थापित करने की कवायद भी है।