*दर्द का रिश्ता*
“पिछले साल नदी में बाढ़ आई तो पूरी फसल डूब गई। इस साल सूखा पड़ गया। घर में अनाज का एक दाना तक नहीं था। खाने के लाले पड़ गए थे। एक रात तो मुझे और पिताजी को भूखे पेट सोना पड़ा।”

*दर्द का रिश्ता*

लेखक-पं.अमरनाथ पांडेय सेवानिवृत शिक्षक, पत्रकार
गली से निकलकर मुख्य मार्ग की ओर मुड़ते ही अचानक एक युवती मेरी स्कूटी से टकराकर सड़क पर गिर पड़ी। उसके हाथ में पकड़ी शीतल तेल और कफ सीरप की शीशियाँ सड़क पर गिरकर टूट गईं। दवाइयाँ बिखरकर नाली में चली गईं।
युवती के गिरते ही आसपास खड़े लोगों ने उसे उठाया। कुछ लोग मुझ पर क्रोधित हो गए और मेरा कॉलर पकड़ लिया। तभी युवती ने उन्हें रोकते हुए कहा—
“गलती मेरी थी। मैं इनकी तरफ देखे बिना जल्दबाजी में सड़क पार करना चाहती थी।”
उसकी सहृदयता देखकर मैं उसकी प्रशंसा किए बिना नहीं रह सका। तभी मैंने देखा, उसके नेत्र सजल थे और आँखों से आँसू टपक रहे थे।
मैंने पूछा, “क्या हुआ?”
उसने भर्राए स्वर में कहा, “माँ के लिए दवा खरीदी थी। वह बहुत बीमार हैं। अब मेरे पास दवा खरीदने के लिए पैसे भी नहीं हैं।”
मैं कुछ देर चुप रहा। फिर उसके हाथ से दवा की पर्ची ली और पास की दुकान से वही दवाइयाँ खरीदकर उसकी हथेली पर रख दीं।
इस बार मेरी सहृदयता से वह हतप्रभ होकर मेरी ओर देखने लगी।
मैंने पूछा, “किस मोहल्ले में रहती हो? चलो, तुम्हें घर छोड़ देता हूँ।”
“जगदीशपुरम में।”
कुछ ही देर बाद मैंने एक पुराने चार कमरों वाले मकान के सामने स्कूटी रोक दी। युवती ने मुझे अंदर आने का इशारा किया।
एक कमरे में तख्त पर उसकी माँ लेटी थीं और लगातार खाँस रही थीं। अपनी बेटी के साथ एक अनजान युवक को देखकर उन्होंने प्रश्नवाचक नजरों से शालिनी की ओर देखा।
शालिनी ने कहा, “माँ, ये श्रवण जी हैं।”
फिर उसने रास्ते में हुई पूरी घटना उन्हें बता दी।
सावित्री देवी ने पास पड़ी कुर्सी की ओर इशारा करते हुए कहा, “बेटा, बैठो।”
कुछ क्षण बाद वह बोलीं—
“शालिनी बेटे से भी बढ़कर मेरी सेवा करती है। इसी की बदौलत मैं आज तक जिंदा हूँ।”
शालिनी मेरे लिए चाय लेकर आई। चाय पीकर जब मैं जाने लगा तो वह मुझे बाहर तक छोड़ने आई। न जाने क्यों, उस पल मुझे उसके व्यवहार में एक अजीब-सा अपनापन महसूस हुआ।
चलते समय मैंने कहा—
“दो दिन बाद तुम्हारी माँ का कुशल-क्षेम पूछने जरूर आऊँगा।”
व्यस्तता के कारण मैं तीसरे दिन ही वहाँ जा सका। मुझे देखते ही शालिनी के चेहरे पर खुशी की चमक आ गई।
अंदर गया तो सावित्री देवी तख्त पर बैठी थीं। उन्हें पहले से बेहतर देखकर मुझे भी सुकून मिला।
कुशल-क्षेम पूछने के बाद जब मैं जाने लगा तो सावित्री देवी ने कहा—
“बेटा, इसे अपना ही घर समझकर आते रहना।”
उनके शब्दों में ऐसा अपनापन था कि मैं कुछ कह नहीं सका।
इसके बाद लगभग एक सप्ताह मैं काम में इतना व्यस्त रहा कि वहाँ नहीं जा पाया।
एक सप्ताह बाद जब मैं शालिनी के घर पहुँचा तो वह अपनी माँ के सिर में शीतल तेल की मालिश कर रही थी। मुझे देखकर दोनों के चेहरे खिल उठे।
मैं कुर्सी पर बैठ गया।
सावित्री देवी ने मुस्कुराते हुए कहा—
“बेटा, कई दिनों बाद याद आई हमारी?”
मैं हँस पड़ा।
बातों-बातों में उन्होंने मेरे बारे में पूछा। मैंने कहा—
“मैं नरसिंहपुर का रहने वाला हूँ। माँ नहीं हैं। घर पर सिर्फ पिताजी हैं। थोड़ी-सी जमीन है, जिसमें किसी तरह साल भर के खाने भर का अनाज पैदा हो जाता है।”
मैं कुछ पल के लिए चुप हुआ, फिर बोला—
“पिछले साल नदी में बाढ़ आई तो पूरी फसल डूब गई। इस साल सूखा पड़ गया। घर में अनाज का एक दाना तक नहीं था। खाने के लाले पड़ गए थे। एक रात तो मुझे और पिताजी को भूखे पेट सोना पड़ा।”
मेरी आवाज भर्रा गई।
“उस रात मैं बहुत रोया। खुद को धिक्कारता रहा। पश्चाताप की आग में जलता रहा। एक श्रवण कुमार वह थे, जिन्होंने अपने माता-पिता को कंधे पर बैठाकर चारों धाम की यात्रा कराई थी… और एक श्रवण मैं हूँ, जिसके रहते मेरे पिताजी को भूखे पेट सोना पड़ा।”
कमरे में कुछ क्षण के लिए सन्नाटा छा गया।
मैंने आगे कहा—
“सुबह मैंने पिताजी से कहा कि गाँव में कोई उद्योग-धंधा नहीं है। मैं शहर जाकर कोई काम करूँगा, ताकि कम से कम दो जून की रोटी का इंतजाम हो सके।”
“शहर आने के बाद एक फर्म में डिलीवरी का काम मिल गया। पहले साइकिल से सामान पहुँचाता था। मेहनत ज्यादा थी, समय भी बहुत लगता था और आमदनी कम होती थी। कुछ दिनों बाद एक पुरानी स्कूटी खरीद ली। अब काम थोड़ा आसान हो गया और आमदनी भी बढ़ गई।”
“इसी कमाई में से कुछ पैसे बचाकर पिताजी को भी भेजता रहता हूँ। फिलहाल फर्म के एक कोने में बने टीन के छोटे-से कमरे में रहता हूँ।”
मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“फर्म की मालकिन बहुत ही मुंहफट और कठोर स्वभाव की हैं। हमेशा गाली-गलौज करती रहती हैं। इसलिए एक कमरे की तलाश में था। कमरा मिलते ही वहाँ से अलग होने का सोच रहा था।”
मेरी बात सुनकर सावित्री देवी कुछ देर चुप रहीं। फिर बोलीं—
“मेरे दो कमरे खाली हैं। यहीं रह जाओ।”
मैं उनकी ओर देखने लगा।
उन्होंने कहा—
“तुम्हें उस महिला से भी छुटकारा मिल जाएगा और हमारी कुछ आर्थिक परेशानी भी दूर हो जाएगी।”
मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि इतनी आसानी से रहने की जगह मिल जाएगी।
मैं उसी घर में रहने लगा।
धीरे-धीरे हम तीनों एक परिवार की तरह घुल-मिल गए। मैं घर की जरूरतों में हाथ बँटाने लगा। शालिनी और मेरे बीच भी नजदीकियाँ बढ़ती गईं।
कब एक-दूसरे की चिंता करने लगे, कब एक-दूसरे की प्रतीक्षा होने लगी और कब मन ही मन एक-दूसरे को चाहने लगे—हमें खुद पता नहीं चला।
मैं घर की जरूरतों में भी यथासंभव सहयोग करने लगा। इससे सावित्री देवी बहुत खुश थीं। मेरे व्यवहार और जिम्मेदारी से वह प्रभावित थीं।
शायद उन्होंने मन ही मन मुझे शालिनी के लिए चुन लिया था।
एक दिन उन्होंने शालिनी से मेरे बारे में बात की। शालिनी शरमा गई और बिना कुछ कहे दूसरे कमरे में चली गई।
कुछ देर बाद सावित्री देवी ने गंभीर होकर कहा—
“बेटा, मैं शालिनी की शादी करके निश्चित हो जाना चाहती हूँ। अगर शालिनी तुम्हें पसंद है तो…”
वह कुछ पल रुकीं।
“मैं जानती हूँ, तुम दोनों एक-दूसरे को बहुत चाहते हो। मैं चाहती हूँ कि तुम शालिनी को अपना लो।”
मेरे भीतर खुशी की लहर दौड़ गई।
मैंने धीमे स्वर में कहा—
“शालिनी से भी पूछ लीजिए।”
सावित्री देवी मुस्कुराईं—
“मैं उससे पूछ चुकी हूँ। वह राजी है।”
फिर उन्होंने कहा—
“तुम अपने पिताजी को भी यहीं बुला लो। हम चारों मिलकर एक साथ रहेंगे।”
मेरी आँखें भर आईं।
जिस घर में कभी भूखे पिता की चिंता लेकर निकला था, उसी जिंदगी ने मुझे एक ऐसा घर दे दिया था, जहाँ अपनापन भी था और रिश्ते भी।
मैंने पिताजी को शहर बुला लिया।
अगले दिन हम मंदिर गए। भगवान को साक्षी मानकर मैंने शालिनी की माँग में सिंदूर भर दिया।
शालिनी ने मेरे पैर छुए और उसकी माँ सावित्री देवी ने मेरे पिताजी के चरण स्पर्श किए।
उस क्षण लगा जैसे जिंदगी ने हमारे पुराने सारे दर्दों को एक नए रिश्ते में बदल दिया हो।
आज हम चारों एक ही छत के नीचे खुशी-खुशी रहते हैं।
हमने दौलत नहीं बाँटी, हमने दर्द बाँटा।
और शायद यही कारण है कि हमारा रिश्ता इतना गहरा है।
क्योंकि कुछ रिश्ते खून से नहीं बनते…
कुछ रिश्ते दर्द से जन्म लेते हैं और प्रेम उन्हें जीवन भर निभाता है।