शहीद बैकुण्ठ शुक्ल – बलिदान गाथा (14 म ई विशेष)

*शहीद बैकुण्ठ शुक्ल – बलिदान गाथा (14 म ई विशेष)*

आलेख – डॉ अनमोल कुमार

बिहार के लाल, आजादी के मतवाले शहीद बैकुण्ठ शुक्ल की कहानी रोंगटे खड़े कर देती है।

कौन थे बैकुण्ठ शुक्ल?
बात जानकारी
जन्म: 15 मई 1907, जलालपुर गांव, वैशाली, बिहार
पिता : योगेंद्र शुक्ल – खुद बड़े क्रांतिकारी, हजारीबाग जेल तोड़कर भागे थे
पढ़ाई : पटना यूनिवर्सिटी से बी.ए.
पेशा ; टीचर, पर नौकरी छोड़कर देश की आजादी में कूद गए
बलिदान की वजह – फणीन्द्र नाथ घोष हत्याकांड

1931 में भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को फांसी हुई। 
उस केस का सरकारी गवाह बना फणीन्द्र नाथ घोष। उसी की गवाही से भगत सिंह को फांसी हुई थी।

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी HSRA ने फैसला किया गद्दार को सजा मिलेगी।

9 नवंबर 1932 : बैकुण्ठ शुक्ल और उनके साथी चंद्रमा सिंह ने बेतिया, बिहार में फणीन्द्र नाथ घोष को गोली मार दी। बदला पूरा हुआ।

गिरफ्तारी और फांसी

गिरफ्तारी : 6 जुलाई 1933 को गिरफ्तार हुए।
मुकदमा : बेतिया जेल में चला। खुद कबूल किया “हां, मैंने मारा। भगत सिंह का बदला लिया।”
फांसी की सजा : अंग्रेज जज ने मौत की सजा सुनाई।
शहादत :  14 मई 1934 को सुबह 6 बजे गया सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई। उम्र थी सिर्फ 27 साल।

आखिरी शब्द: फांसी से पहले बोले – “एक भगत सिंह मरेगा तो हजार भगत सिंह पैदा होंगे।”

पिता-पुत्र दोनों शहीद

गजब संयोग – बैकुण्ठ शुक्ल के पिता योगेंद्र शुक्ल भी आजादी की लड़ाई में जेल में थे। 
बेटे की फांसी के 2 दिन बाद 16 मई 1934 को पिता भी जेल में शहीद हो गए। बिहार का ये अकेला घर है जहां बाप-बेटे दोनों ने देश पर जान दी।

विरासत – आज क्या है?

बैकुण्ठ शुक्ल सेतु : बेतिया में गंडक नदी पर पुल का नाम।
शहीद पार्क : हाजीपुर, वैशाली में प्रतिमा लगी है।
गया जेल : जिस फांसी घर में शहीद हुए, वो अब “शहीद स्मारक” है।
14 मई : हर साल बिहार में शहीद बैकुण्ठ शुक्ल बलिदान दिवस मनता है।

एक लाइन में बलिदान गाथा*

“भगत सिंह को फांसी देने वाले गवाह को गोली मारकर,   बिहार का जवान खुद हंसते-हंसते फांसी चढ़ गया – नाम था बैकुण्ठ शुक्ल।”

आज भी वैशाली के बच्चे गाते हैं: 
“जलालपुर का छोरा, फांसी चढ़ गया भोरा, 
देश पे जान दे गया, बैकुण्ठ शुक्ल तोरा।”

Categories: शिक्षा, समाजवाद