समाजवादियों का समाजवाद बहुसंख्यक मतदाताओं को रास नहीं आया।

प्रो.अरविंद नाथ तिवारी
सम्पादक,नारायणी न्यूज
बिहार विधान सभा2025 के चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस का मानवतावाद और समाजवादियों का समाजवाद ढहता नजर आ रहा है।बहुसंख्यक मतदाताओं को कांग्रेस का मानवतावाद और समाजवादियों का समाजवाद रास नहीं आया,क्यों इनको रास आये?क्योंकि इनकी भूमिका को जनता संदीग्धता सै देख रही है,इनके कथनी और करनी में फर्क दिखाई देने लगा है।आम जनता का विश्वास इनसे समाप्त होने लगी है।इनके विद्रूप समाजवाद से जनता भड़क गयी है।आजादी के पहले गाँधी जी के सामाजिक उद्धार आंदोलन को आगे बढ़ाते हुए राम मनोहर लोहिया दिखाई पड़ते हैं,जिन्होंने गाँधी जी के सामाजिक उद्धार आंदोलन को विश्वस्तरीय पहुंचाया।देश के आजादी के बाद गांधी जी के राजनीतिक आंदोलन के परिणाम को कांग्रेसियों ने दिशा और दशा भ्रमित कर दिया, उसी तरह समाजवादियों ने समाजवाद के दिशा और दशा को वर्तमान में कलंकित कर रखा है। वर्तमान में भारत के अंदर जो समाजवाद की रूपरेखा बनती जा रही है, उससे समाजवाद पर कई प्रश्न खड़े हो रहें हैं। आज के समाजवादियों के द्वारा अपने और अपने पीढ़ियों के लिए आलीशान बंगला बनाना, लग्जरियस गाड़ी और धन दौलत इकट्ठा करना समाजवाद बन गया है,जिसके प्रतीक लालू प्रसाद यादव और स्वर्गीय मुलायमसिंह यादव दिखाई पड़ रहें हैं,इनलोगों ने समाजवाद के रूप को बदल दिया ,इनका समाजवाद बेटा और पतोहू को सत्ता दिलाना है।प्रश्न यह उठता है कि क्या गांधीजी ने बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में इसी समाजवाद की रूपरेखा खींची थी। क्या गांधीजी आज होते, तो क्या आज के समाजवादियों को देखकर प्रसन्न होते। गांधी जी के समाजवाद से प्रभावित होकर और बाद में समाजवाद की एक बड़ी लक्ष्मण रेखा खींचकर, विश्वस्तरीय आंदोलन देनेवाले राम मनोहर लोहिया क्या वर्तमान समाजवाद के लिए जिम्मेदार हैं, या इनके अनुनायी जिम्मेदार हैं।भारत में समाजवाद का औपनिवेशिक ब्रिटिश राज के खिलाफ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के विषय में बीसवीं शताब्दी के आरंभ में स्थापित एक राजनीतिक आंदोलन था। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में गांधी जी के द्वारा छेड़ा गया यह समाजवादी आंदोलन भारत में किसानों और मजदूरों के बीच बड़ी तेजी से लोकप्रिय हुआ,यही कारण है कि बिहार के मजदूर और किसान कांग्रेस और राजद के समाजवादी आंदोलन को वर्तमान में समझ चुकी है।दोनों दलों के कथनी और करनी में अंतर आने के कारण बहुसंख्यक मतदाता इनको वोट देना नहीं चाह रही,जब तक दोनों दलों के कथनी और करनी एक नहीं होगी,तब तक सत्ता से ये बाहर रहेंगै।ईवीएम का मैनेज हो जाना ,वोट चोरी की बात कहना,ये सब कहकर जनता को बताते रहिए,पर समाजवाद का विद्रूप चेहरा को
भी स्वीकार करनी पड़ेगी,महागठबंधन को अयनै आचरण को बदलना पड़ेगा,तब बहुसंख्यक मतदाता अपना वोट देंगे,नहीं तो आनेवाले समय में आज की अपेक्षा समाजवादियों के लिए और बुरा होगा।यक्ष प्रश्न यह है कि लोहिया जी गांधी जी के समाजवाद से प्रभावित होकर समाजवाद के प्रसार और सामाजिक समरसता को जमीं पर उतारने के लिए आजादी के बाद सत्ता सुख तक त्याग दिया,अनेक यातनाएं झेली।उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बिहार में नीतीश कुमार की सरकार आरजेडी के साथ रही। सभी लोहिया के फॉलोवर हैं,सभी राम मनोहर लोहिया की दुहाई देते हैं, पर लोहिया के सपनों पर चलने को कोई तैयार नहीं।लोहिया के समाजवाद में एक देश की दूसरे देश में जो पूंजी लगी है, उसे जब्त करना, सभी लोगों को संसार में कहीं भी आने-जाने व बसने का अधिकार देना, दुनिया के सभी राष्ट्रों को राजनैतिक आजादी तथा विश्व नागरिकता की बात थी। बिना पुलिस के शासन की बात लोहिया करते हैं, मगर आज के समाजवादी बगैर पुलिस का शासन चलाना तो दूर, बगैर पुलिस के चार कदम चल नहीं सकते, उन्हें जनता से भय लगता है।